यामी गौतम धर और इमरान हाशमी का दमदार अभिनय
सत्य घटना पर आधारित फ़िल्म “हक़” जो शाह बानो मामले पर है । इस फिल्म में मिली-जुली समीक्षाएं मिली हैं। जहाँ यामी गौतम धर और इमरान हाशमी के अभिनय की जितनी तारीफ़ की जाए कम है, वही फ़िल्म में जटिल विषय को संवेदनशीलता और संयम से पेश करने की भी। इस फिल्म में कुछ ने कहा कि फ़िल्म का दूसरा भाग पहले भाग की तुलना में कम प्रभावशाली लगता है। वही कुछ ने कहा की फिल्म शुरुवात से बेमिसाल थी ।

आईये इस फिल्म के कुछ सकारात्मक बिंदु पर ध्यान दे
अभिनय: समीक्षकों ने मुख्य कलाकारों, मुख्य पात्र यामी गौतम धर और पति व वकील की दोहरी भूमिका में इमरान हाशमी के बेमिसाल अभिनय की अक्सर सराहना की। शीबा चड्ढा और दानिश हुसैन जैसे सहायक कलाकारों की भी तारीफ हुई।भावनात्मक प्रभाव: फिल्म को भावनात्मक रूप से बताया गया है, जो नायक के सम्मान और अधिकारों के लिए संघर्ष को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है।
आलोचना के बिंदु
गति: कुछ समीक्षाओं में बताया है कि फिल्म की गति धीमी है, और दूसरा भाग पहले भाग जितना मजबूत नहीं है।
रैखिकता गुणों और सरलता: एक समीक्षा में फिल्म को “नीरस रैखिकता” वाला बताया गया, और हालांकि कुछ लोगों ने इसकी सरलता को इसकी ताकत के रूप में देखा, लेकिन अन्य लोगों ने इसे नकारात्मक रूप से देखा।
व्यावसायिक पहलू: हक को एक व्यावसायिक मनोरंजक फिल्म के बजाय एक गंभीर, विषय-वस्तु से प्रेरित फिल्म माना जाता है, जो सभी दर्शकों को पसंद नहीं आएगी।
कोर्टरूम ड्रामा: कुछ आलोचकों का मानना था कि कोर्टरूम ड्रामा अधिक प्रभावशाली हो सकता था।
राजनीतिक बारीकियां: कुछ समालोचना ने कहा कि हालांकि फिल्म स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण नहीं है, लेकिन इसकी “नीरस रैखिकता” एक विशिष्ट राजनीतिक संदेश देती है और इसमें कुछ ऐतिहासिक घटनाओं को क्रेडिट के बाद के पाठ तक सीमित कर दिया गया है।

कुल मिलाकर हक एक ऐसी फिल्म है जिसकी प्रशंसा इसके सशक्त अभिनय और शाहबानो मामले के संवेदनशील चित्रण के लिए की गई है, लेकिन इसकी धीमी गति और एकरेखीय कथा के लिए इसकी आलोचना भी की गई है।
यह एक व्यावसायिक मनोरंजन के बजाय विषय-वस्तु पर आधारित सामाजिक नाटक है।
फिल्म का संदेश स्पष्ट है: अपनी गरिमा के लिए लड़ना अधिकार है, कोई उपकार नहीं।
